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Poetry for her - तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं

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तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं
तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं शाख़ों पे दूर तक कोई पत्ता हरा नहीं
ख़ामोशियाँ भरी हैं फ़ज़ाओं में इन दिनों हम ने भी मौसमों से इधर कुछ कहा नहीं
तू ने ज़बाँ न खोली सुख़न मैं ने चुन लिए तू ने वो पढ़ लिया जिसे मैं ने लिखा नहीं
ये कौन सी जगह है ये बस्ती है कौन सी कोई भी इस जहान में तेरे सिवा नहीं
चलिए बहुत क़रीब से सब देखना हुआ अपने गुमाँ से हट के कहीं कुछ हुआ नहीं
छोड़ा है जाने किस ने मुझे बाल-ओ-पर के साथ ये किन बुलंदियों पे जहाँ पर हवा नहीं
रंग-ए-तलब है कौन सी मंज़िल में क्या कहें आँखों में मुद्दआ नहीं लब पर सदा नहीं
पीछे तिरे ऐ राहत-ए-जान कुछ न पूछियो क्या क्या हुआ नहीं यहाँ क्या कुछ हुआ नहीं.... Poetry for her- तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं

जानते हो एहसास क्या है!

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जानते हो एहसास क्या है!
जानते हो एहसास क्या है! कभी अथाह नीले समंदर में डूबती शाम को देखना, जरा देर खामोशी से साहिल से टकराती लहरों के पास बैठकर, सारी शाम घुल के फिर पानी में, लहर बन के आयेगी, होले से तुम्हारे पैरों को छू जायेगी तुम आँख बंद कर महसूस करना तुम्हें लगेगा जैसे कोई ख़्याल तुम्हें होले-होले खुद में डुबो रहा है हाँ, एहसास यही है ये जो अभी तुम्हें हो रहा है...

जानते हो एहसास क्या है!

घर की खिड़की से जब देखा मैंने,

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घर की खिड़की से जब देखा मैंने,
घर की खिड़की से जब देखा मैंने, मौसम की पहली बरसात को, काले बादलों की गरज पर नाचती, बूंदों की बारात को... एक बच्चा मुझमें से निकलकर, भागा था भीगने बाहर, रोका बड़प्पन ने मेरे, पकड़ के उसके हाथ को.. बारिश और मेरे बचपने के बीच, इक उम्र की दीवार खड़ी हो गई, लगता है मेरे बचपन की बारिश भी, अब बड़ी हो गई..
वो बूंदे कांच की दीवार पर खटखटा रही थीं, मैं उनके संग खेलता था कभी, शायद इसलिये मुझे बुला रही थीं, पर तब मैं छोटा था और ये बातें बड़ी थीं, तब घर वक्त पर जाने की किसे पड़ी थी, सावन जब चाय और पकोड़ों की सोहबत में, इत्मिनान से बीतता था, फिर वो दौर... वो घड़ी... बड़ी होते होते कहीं खो गई, लगता है मेरे बचपन की बारिश भी, अब बड़ी हो गई..

घर की खिड़की से जब देखा मैंने,

कुछ यादों पर पहरे हैं,

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कुछ यादों पर पहरे हैं,

कुछ यादों पर पहरे हैं, कुछ घाव बड़े गहरे हैं, कुछ अपनों को मैंने छोड़ा है, कुछ ज़िन्दगी ने भी मुंह मोड़ा है,
कुछ यादें हैं जो बहुत सताती हैं, कुछ मंज़िलें हैं जो दूर हो जाती हैं, कुछ मासूम सपनों की गुनहगार हूँ, कुछ आंसुओं की भी हकदार हूँ,
कुछ रास्तों पर चलना बाकी है, कुछ ऐसा भी है जो बदलना बाकी है, कुछ माफियां हासिल मुझे करनी हैं, कुछ आँखों में रौशनी भरनी है,
कुछ पर्दे मुझे हाथों से हटाने हैं, कुछ राज़ अब बताने हैं, कुछ टूटे दिलो को जोड़ना चाहती हूँ, कुछ कसमें ओढ़ना चाहती हूँ,
कुछ गुनाह कम करवाने हैं, कुछ हाथों पर हाथ बढ़ाने हैं, कुछ चेहरों को पास से पढ़ना है, कुछ ख्वाहिशो को परवाज़ चढ़ना है...

I hope you like this poetry -कुछ यादों पर पहरे हैं,



Poetry about life - घर चाहे कैसा भी हो..

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Read Poetry about life - घर चाहे कैसा भी हो..
घर चाहे कैसा भी हो.. उसके एक कोने में.. खुलकर हंसने की जगह रखना..
सूरज कितना भी दूर हो.. उसको घर आने का रास्ता देना..
कभी कभी छत पर चढ़कर.. तारे अवश्य गिनना.. हो सके तो हाथ बढ़ा कर.. चाँद को छूने की कोशिश करना .
अगर हो लोगों से मिलना जुलना.. तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..
भीगने देना बारिश में.. उछल कूद भी करने देना.. हो सके तो बच्चों को.. एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..
कभी हो फुरसत,आसमान भी साफ हो.. तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना.. हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..
घर के सामने रखना एक पेड़.. उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य  सुनना..
घर चाहे कैसा भी हो.. घर के एक कोने में.. खुलकर हँसने की जगह रखना.
चाहे जिधर से गुज़रिये मीठी सी हलचल मचा दिजिये,
उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है अपनी उम्र का मज़ा लिजिये.
ज़िंदा दिल रहिए जनाब, ये चेहरे पे उदासी कैसी वक्त तो बीत ही रहा है, *उम्र की एेसी की तैसी...!¡!
I hope you like to read Poetry about life- घर चाहे कैसा भी हो..

बस इतना सा ही कहना था कि...

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बस इतना सा ही कहना था कि...
बस इतना सा ही कहना था कि... जब बिना वजह ही अकेले में मुस्कुराता हूँ, ज़रा सी फुरसत मिले तो बस तुम में डूब जाता हूँ, जब भी आती हो ज़हन में धड़कनें तेज़ कर देती हो मेरी, तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....
बस इतना सा ही कहना था कि.. जब तुम्हारे उस गुलाबी सूट की लाल सुर्ख पत्तियां याद आती हैं, जब अंधेरे में तुम्हारे हाथों की जलाईं मोमबत्तियां याद आती हैं, जब जब मेरी नब्ज़ फिर से उठने में कर देती है देरी....तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....
बस इतना सा ही कहना था कि.. जब एक बार तुम्हारे लिए नौ दिन व्रत रखे थे, तुम साबूदाने की खिचड़ी ऑफिस लातीं थीं, जब तक मैं न खा लेता तुम भी न खातीं थीं, आज भी साबूदाने की खिचड़ी देख कर मुस्कान होंठो पे आ जाती है मेरी....तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....
बस इतना सा ही कहना था कि.. जब भी कभी तुम मुझे देखा करतीं थीं, मैं नज़रें चुराने लगता था, इधर उधर देखकर शर्म से मुस्कुराने लगता था, आज तेरी तस्वीर से भी जब वही हालत हो जाती है मेरी.....तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में

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कभी यूँ भी आ मेरी आँख में
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो
वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो
मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महवे- ख़्वाब है चाँदनी न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो
ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी न बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बे-चिराग़ ये घर न हो
कभी दिन की धूप में झूम कर, कभी शब के फूल को चूम कर यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के करीब आ तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में,