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Showing posts from September, 2018

कुछ यादों पर पहरे हैं,

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कुछ यादों पर पहरे हैं,

कुछ यादों पर पहरे हैं, कुछ घाव बड़े गहरे हैं, कुछ अपनों को मैंने छोड़ा है, कुछ ज़िन्दगी ने भी मुंह मोड़ा है,
कुछ यादें हैं जो बहुत सताती हैं, कुछ मंज़िलें हैं जो दूर हो जाती हैं, कुछ मासूम सपनों की गुनहगार हूँ, कुछ आंसुओं की भी हकदार हूँ,
कुछ रास्तों पर चलना बाकी है, कुछ ऐसा भी है जो बदलना बाकी है, कुछ माफियां हासिल मुझे करनी हैं, कुछ आँखों में रौशनी भरनी है,
कुछ पर्दे मुझे हाथों से हटाने हैं, कुछ राज़ अब बताने हैं, कुछ टूटे दिलो को जोड़ना चाहती हूँ, कुछ कसमें ओढ़ना चाहती हूँ,
कुछ गुनाह कम करवाने हैं, कुछ हाथों पर हाथ बढ़ाने हैं, कुछ चेहरों को पास से पढ़ना है, कुछ ख्वाहिशो को परवाज़ चढ़ना है...

I hope you like this poetry -कुछ यादों पर पहरे हैं,



Poetry about life - घर चाहे कैसा भी हो..

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Read Poetry about life - घर चाहे कैसा भी हो..
घर चाहे कैसा भी हो.. उसके एक कोने में.. खुलकर हंसने की जगह रखना..
सूरज कितना भी दूर हो.. उसको घर आने का रास्ता देना..
कभी कभी छत पर चढ़कर.. तारे अवश्य गिनना.. हो सके तो हाथ बढ़ा कर.. चाँद को छूने की कोशिश करना .
अगर हो लोगों से मिलना जुलना.. तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..
भीगने देना बारिश में.. उछल कूद भी करने देना.. हो सके तो बच्चों को.. एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..
कभी हो फुरसत,आसमान भी साफ हो.. तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना.. हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..
घर के सामने रखना एक पेड़.. उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य  सुनना..
घर चाहे कैसा भी हो.. घर के एक कोने में.. खुलकर हँसने की जगह रखना.
चाहे जिधर से गुज़रिये मीठी सी हलचल मचा दिजिये,
उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है अपनी उम्र का मज़ा लिजिये.
ज़िंदा दिल रहिए जनाब, ये चेहरे पे उदासी कैसी वक्त तो बीत ही रहा है, *उम्र की एेसी की तैसी...!¡!
I hope you like to read Poetry about life- घर चाहे कैसा भी हो..

बस इतना सा ही कहना था कि...

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बस इतना सा ही कहना था कि...
बस इतना सा ही कहना था कि... जब बिना वजह ही अकेले में मुस्कुराता हूँ, ज़रा सी फुरसत मिले तो बस तुम में डूब जाता हूँ, जब भी आती हो ज़हन में धड़कनें तेज़ कर देती हो मेरी, तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....
बस इतना सा ही कहना था कि.. जब तुम्हारे उस गुलाबी सूट की लाल सुर्ख पत्तियां याद आती हैं, जब अंधेरे में तुम्हारे हाथों की जलाईं मोमबत्तियां याद आती हैं, जब जब मेरी नब्ज़ फिर से उठने में कर देती है देरी....तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....
बस इतना सा ही कहना था कि.. जब एक बार तुम्हारे लिए नौ दिन व्रत रखे थे, तुम साबूदाने की खिचड़ी ऑफिस लातीं थीं, जब तक मैं न खा लेता तुम भी न खातीं थीं, आज भी साबूदाने की खिचड़ी देख कर मुस्कान होंठो पे आ जाती है मेरी....तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....
बस इतना सा ही कहना था कि.. जब भी कभी तुम मुझे देखा करतीं थीं, मैं नज़रें चुराने लगता था, इधर उधर देखकर शर्म से मुस्कुराने लगता था, आज तेरी तस्वीर से भी जब वही हालत हो जाती है मेरी.....तब तब समझ मे आता है....कुछ तो अब भी हो तुम मेरी....

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में

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कभी यूँ भी आ मेरी आँख में
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो
वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो
मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महवे- ख़्वाब है चाँदनी न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो
ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी न बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बे-चिराग़ ये घर न हो
कभी दिन की धूप में झूम कर, कभी शब के फूल को चूम कर यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के करीब आ तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, 

फिर छिड़ी रात बात फूलों की

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की 
फिर छिड़ी रात बात फूलों की  रात है या बरात फूलों की
फूल के हार फूल के गजरे शाम फूलों की रात फूलों की
आप का साथ साथ फूलों का आप की बात बात फूलों की
नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं मिल रही है हयात फूलों की
कौन देता है जान फूलों पर कौन करता है बात फूलों की
वो शराफ़त तो दिल के साथ गई लुट गई काएनात फूलों की
अब किसे है दिमाग़-ए-तोहमत-ए-इश्क़ कौन सुनता है बात फूलों की
मेरे दिल में सुरूर-ए-सुब्ह-ए-बहार तेरी आँखों में रात फूलों की
फूल खिलते रहेंगे दुनिया में रोज़ निकलेगी बात फूलों की
ये महकती हुई ग़ज़ल जैसे सहरा में रात फूलों की
फिर छिड़ी रात बात फूलों की

इश्क़ में जब भी बिछड़ने की घड़ी होती है,

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इश्क़ में जब भी बिछड़ने की घड़ी होती है,
इश्क़ में जब भी बिछड़ने की घड़ी होती है, ज़िन्दगी मौत की चौखट पे खड़ी होती है. .. उसको आसानी से बदला भी नहीं जा सकता, यार बुनियाद में जो चीज़ गड़ी होती है. .. कच्ची मिट्टी से बनाई हुई दीवार है इश्क़, ये इमारत बड़ी मुश्किल से खड़ी होती है. .. कौन बाज़ार में रुकता है किसी की ख़ातिर, सब को घर लौट के जाने की पड़ी होती है. .. क्या ज़ुरूरी है बड़े ख़्वाब ही देखे जाएं, छोटे ख़्वाबों की भी ताबीर बड़ी होती है. .. तू नहीं है तो कोई चीज़ ठिकाने पे नहीं, ढूढंता फिरता हूँ और घर मे पड़ी होती है . .. इश्क़ में जब भी बिछड़ने की घड़ी होती है,

कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...

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कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...
कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...
वो सुबह कैसी होती है अंधेरों के उस तरफ रिश्ता कैसा होता है सात फेरों के उस तरफ क्योंकि हम तुम तो साथ साथ चले थे न न आगे तुम, न आगे मैं, हर उलझन में एक साथ उलझे थे न तुम्हारा इतने सालों तक मुझे याद न करना, ज़रा खलता है पर जब लगता है तुम खुश होगी, तो फिर सब चलता है...
मगर कुछ पूँछना चाह रहा था तुमको एक अरसे से आखिर तुम्हारी मर्ज़ी पर ही सब चीज़ छोड़ी है और तुम जवाब दोगी ये उम्मीद थोड़ी है....
क्या वो भी तुमको देखता है कभी कभी छुप छुप कर क्या तुम्हारे गाल पर से लट हटाता है रातों को उठ उठ कर क्या उसके सामने बहुत संभल कर पेश आती हो तुम दिन भर किस बात में उलझी रहीं, क्या सब बताती हो तुम या उससे भी बात करते करते एक गहरी सांस छोड़ देती हो और वो अधूरी बात समझ जाता है वो तुम्हारे बारे में जो सोचता है, क्या तुम्हे बताता है क्या अपनी छोटी उंगली उसकी छोटी उंगली में मर्ज़ी से फंसाती हो हाँ हाँ, मुझे याद है तुम सब छुपा लेती हो और बस रिश्ता निभाती हो
तुम्हारे पास कितनी साड़ियां हैं, और कौन से रंग की है, उसको मालूम भी है मेरा तो कितनी बार इम्…

भूलाकर उसने मुझको गैरो पर है ऐतबार किया

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भूलाकर उसने मुझको गैरो पर है ऐतबार किया
भूलाकर उसने मुझको गैरो पर है ऐतबार किया।
यारो, ये ज़हर पीकर भी मैंने उससे प्यार किया।

चाहा तुझको दुनिया की हर चीज़ से ज्यादा।
तू ही बात क्या गलती की मैंने जो तुजसे प्यार किया।

थककर हार गया जब ढूंढते ढूढते उसको।
आँखे बंद की अपनी ओर उसका दीदार किया।

शिकवा ना किया कभी किसी बात का उसकी।
बेवफाई को भी उसकी तहे दिल से स्वीकार किया।

तोड़े अपनों से हर रिश्ते नाते खातिर तेरी।
क्या कुछ नहीं मैंने तेरे लिए मेरे यार किया।

कुछ ऐसा जूनून था पाने का उसको।
ना रात देखी ना दिन का इंतज़ार किया।

भुलाकर तुझको बढ़ जायेंगे जिंदगी में आगे।
झूठा ये वादा हमने खुद से कई बार किया।

रंग रूप से क्या लेना देना था हमको।
जिसने भी दिल से चाहा उसे बेइंतिहा प्यार किया।

एक बार कहके तो देख ,सब कुछ लुटा देंगे अपना।
दिल जिगर क्या चीज़ है, जा को भी तुझ पर है निसार किया।

भूलाकर उसने मुझको गैरो पर है ऐतबार किया

आज फिर यादों का संदूक खोला

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आज फिर यादों का संदूक खोला
तो कुछ ख़त निकले

कुछ तम्मन्नाए बिखरी
एक सूखी गुलाब की पंखुड़ी निकली

कुछ कच्चे पक्के वादे निकले
कुछ झूठी सच्ची यादें निकली

वो अलहड़पन की बेबाक़ हँसी
और वो मस्त मलँग सी बातें निकली

तुम्हारे कानो का झूमर निकला
और पाज़ेब की वो खनखन बिखरी

नयनों का काजल  भी बिखरा
होंठो की वो मुसकान भी बिखरी

वो चाँद के अंचल तले
क़ी थी जो कितनी बातें निकली

आज फिर यादों का संदूक खोला
कुछ ख़त निकले कुछ यादें बिखरी

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं

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कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं तुम कह देना  कोई खास नही एक दोस्त है कच्चा -पक्का सा एक झूठ है आधा- सच्चा सा जज्बातों को परदे दे देना गढ़ देना बहाना अच्छा सा कि  जीवन का ऐसा साथी  है जो दूर सा है  कुछ पास नही
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं   तुम कह देना कोई खास नहीं
हवा का ठंडा झोका है इक कभी नाजुक तो कभी तूफां सा कह देना गुजरा  लम्हा है कुछ टूटा सा कुछ रूठा सा जीवन का ऐसा दरिया है जिसकी मुझको कोई प्यास नही
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं    तुम कह देना, कोई खास नहीं
इक साथी जो अनजान  सी बाते कर जाता है यादो मे जिसका धुंधला सा अक्स नजर आता है यूँ तो रहता है तसव्वुर मे हरसूं पर मुझको उसकी तलाश नही
  कोई तुमसे पूछे,कौन हूँ मैं     तुम कह देना ,कोई खास नही
                         कोई खास नहीं :
                     कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं