आज फिर यादों का संदूक खोला

आज फिर यादों का संदूक खोला
तो कुछ ख़त निकले

कुछ तम्मन्नाए बिखरी
एक सूखी गुलाब की पंखुड़ी निकली

कुछ कच्चे पक्के वादे निकले
कुछ झूठी सच्ची यादें निकली

वो अलहड़पन की बेबाक़ हँसी
और वो मस्त मलँग सी बातें निकली

तुम्हारे कानो का झूमर निकला
और पाज़ेब की वो खनखन बिखरी

नयनों का काजल  भी बिखरा
होंठो की वो मुसकान भी बिखरी

वो चाँद के अंचल तले
क़ी थी जो कितनी बातें निकली

आज फिर यादों का संदूक खोला
कुछ ख़त निकले कुछ यादें बिखरी

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