कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...

कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...


कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...

वो सुबह कैसी होती है अंधेरों के उस तरफ
रिश्ता कैसा होता है सात फेरों के उस तरफ
क्योंकि हम तुम तो साथ साथ चले थे न
न आगे तुम, न आगे मैं, हर उलझन में एक साथ उलझे थे न
तुम्हारा इतने सालों तक मुझे याद न करना, ज़रा खलता है
पर जब लगता है तुम खुश होगी, तो फिर सब चलता है...

मगर कुछ पूँछना चाह रहा था तुमको एक अरसे से
आखिर तुम्हारी मर्ज़ी पर ही सब चीज़ छोड़ी है
और तुम जवाब दोगी ये उम्मीद थोड़ी है....

क्या वो भी तुमको देखता है कभी कभी छुप छुप कर
क्या तुम्हारे गाल पर से लट हटाता है रातों को उठ उठ कर
क्या उसके सामने बहुत संभल कर पेश आती हो तुम
दिन भर किस बात में उलझी रहीं, क्या सब बताती हो तुम
या उससे भी बात करते करते एक गहरी सांस छोड़ देती हो और वो अधूरी बात समझ जाता है
वो तुम्हारे बारे में जो सोचता है, क्या तुम्हे बताता है
क्या अपनी छोटी उंगली उसकी छोटी उंगली में मर्ज़ी से फंसाती हो
हाँ हाँ, मुझे याद है तुम सब छुपा लेती हो और बस रिश्ता निभाती हो

तुम्हारे पास कितनी साड़ियां हैं, और कौन से रंग की है, उसको मालूम भी है
मेरा तो कितनी बार इम्तिहान लिया था तुमने अपने सूटों के रंग पर
तुमको आईने की ज़रूरत पड़ती है अब, या उससे भी पूँछ लेती हो आंखों से कि "कैसी लग रही हुँ मैं", कभी जवाब आया क्या?
क्या अब अपने आंसू रोक लेती हो तुम, मत दो मुझे ये गुरुर कह कर कि तुमने आखरी कांधा मेरा ही भिगोया था
कभी बताया उसने कि जब तुम खुले बालों में होती हो तो तुमसे निगाह हटाना मुश्किल है
कभी करवट लेकर जब लेटती हो तो करीब आ कर पूंछता है क्या कि "कहीं तुम नाराज़ तो नहीं"??

न जाने ऐसी कितनी बातें की हैं तुमसे गुज़रे सालों में
मुझे तो पहले की ही तरह बनकर मिलना ख्यालों में
थोड़ी देर ही सही फिर से उलझनों में उलझाना मुझको
कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...

कभी यूँ मिलो तो सब बताना मुझको...



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