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Showing posts from October, 2018

Poetry for her - तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं

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तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं
तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं शाख़ों पे दूर तक कोई पत्ता हरा नहीं
ख़ामोशियाँ भरी हैं फ़ज़ाओं में इन दिनों हम ने भी मौसमों से इधर कुछ कहा नहीं
तू ने ज़बाँ न खोली सुख़न मैं ने चुन लिए तू ने वो पढ़ लिया जिसे मैं ने लिखा नहीं
ये कौन सी जगह है ये बस्ती है कौन सी कोई भी इस जहान में तेरे सिवा नहीं
चलिए बहुत क़रीब से सब देखना हुआ अपने गुमाँ से हट के कहीं कुछ हुआ नहीं
छोड़ा है जाने किस ने मुझे बाल-ओ-पर के साथ ये किन बुलंदियों पे जहाँ पर हवा नहीं
रंग-ए-तलब है कौन सी मंज़िल में क्या कहें आँखों में मुद्दआ नहीं लब पर सदा नहीं
पीछे तिरे ऐ राहत-ए-जान कुछ न पूछियो क्या क्या हुआ नहीं यहाँ क्या कुछ हुआ नहीं.... Poetry for her- तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं

जानते हो एहसास क्या है!

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जानते हो एहसास क्या है!
जानते हो एहसास क्या है! कभी अथाह नीले समंदर में डूबती शाम को देखना, जरा देर खामोशी से साहिल से टकराती लहरों के पास बैठकर, सारी शाम घुल के फिर पानी में, लहर बन के आयेगी, होले से तुम्हारे पैरों को छू जायेगी तुम आँख बंद कर महसूस करना तुम्हें लगेगा जैसे कोई ख़्याल तुम्हें होले-होले खुद में डुबो रहा है हाँ, एहसास यही है ये जो अभी तुम्हें हो रहा है...

जानते हो एहसास क्या है!

घर की खिड़की से जब देखा मैंने,

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घर की खिड़की से जब देखा मैंने,
घर की खिड़की से जब देखा मैंने, मौसम की पहली बरसात को, काले बादलों की गरज पर नाचती, बूंदों की बारात को... एक बच्चा मुझमें से निकलकर, भागा था भीगने बाहर, रोका बड़प्पन ने मेरे, पकड़ के उसके हाथ को.. बारिश और मेरे बचपने के बीच, इक उम्र की दीवार खड़ी हो गई, लगता है मेरे बचपन की बारिश भी, अब बड़ी हो गई..
वो बूंदे कांच की दीवार पर खटखटा रही थीं, मैं उनके संग खेलता था कभी, शायद इसलिये मुझे बुला रही थीं, पर तब मैं छोटा था और ये बातें बड़ी थीं, तब घर वक्त पर जाने की किसे पड़ी थी, सावन जब चाय और पकोड़ों की सोहबत में, इत्मिनान से बीतता था, फिर वो दौर... वो घड़ी... बड़ी होते होते कहीं खो गई, लगता है मेरे बचपन की बारिश भी, अब बड़ी हो गई..

घर की खिड़की से जब देखा मैंने,