घर की खिड़की से जब देखा मैंने,

घर की खिड़की से जब देखा मैंने,


घर की खिड़की से जब देखा मैंने,
मौसम की पहली बरसात को,
काले बादलों की गरज पर नाचती,
बूंदों की बारात को...
एक बच्चा मुझमें से निकलकर,
भागा था भीगने बाहर,
रोका बड़प्पन ने मेरे,
पकड़ के उसके हाथ को..
बारिश और मेरे बचपने के बीच,
इक उम्र की दीवार खड़ी हो गई,
लगता है मेरे बचपन की बारिश भी,
अब बड़ी हो गई..

वो बूंदे कांच की दीवार पर खटखटा रही थीं,
मैं उनके संग खेलता था कभी,
शायद इसलिये मुझे बुला रही थीं,
पर तब मैं छोटा था और ये बातें बड़ी थीं,
तब घर वक्त पर जाने की किसे पड़ी थी,
सावन जब चाय और पकोड़ों की सोहबत में,
इत्मिनान से बीतता था,
फिर वो दौर... वो घड़ी...
बड़ी होते होते कहीं खो गई,
लगता है मेरे बचपन की बारिश भी,
अब बड़ी हो गई..

घर की खिड़की से जब देखा मैंने,



Comments

Popular posts from this blog

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं

Poetry about life - घर चाहे कैसा भी हो..

बस इतना सा ही कहना था कि...